उदयपुर | उदयपुर के 475 वे स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत दूसरे दिन जनार्दन राय नगर विद्यापीठ एवं लोकजन सेवा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में *उदयपुर की संस्कृति एवं विरासत* विषय पर आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता कुलपति कर्नल शिव सिंह सारंगदेवोत ने की। मुख्य अतिथि कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर एवं विशिष्ट अतिथि पूर्व कुलपति उमाशंकर शर्मा थे
माता सरस्वती की प्रतिमा एवं महाराणा उदय सिंह के चित्र सनमुख दीप प्रचलन एवं अध्यक्ष प्रोफेसर विमल शर्मा के स्वागत उद्बोधन के पश्चात मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए डॉ राजेंद्र नाथ पुरोहित ने सज्जन निवास बाग (गुलाब बाग ) के सन् 1882 से 1920 तक के सफर का बखूबी चित्रण करते हुए हर निर्माण के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि जगत सिंह द्वितीय के पश्चात ही झीलों के आसपास निर्माण कार्य होकर झीलों में प्रदूषण प्रारंभ हुआ।
कुलाधिपति भंवर लाल गुर्जर ने कहा कि उदयपुर का पिछोली गांव से आज तक का सफर आम जनता के सहयोग से ही पूरा हुआ है इसी प्रकार हम आम जनता को ही सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने का दायित्व निभाना होगा ।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कर्नल सारंगदेवोत ने कहा कि प्रकृति, संस्कृति एवं विरासत को बचाए रखने की आवश्यकता हम सभी मनुष्यों की है। मेवाड़ की परंपरा, आचरण, सद्भावना जैसी अमूर्त विशेषताए आपको अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलेगी, इन्हें बचाए रखना व अगली पीढ़ी में स्थापित करने का दायित्व हम सब पर है।
डॉ जीवन सिंह खरकवाल ने उदयपुर स्थापना के पूर्व यहां की स्थिति का वर्णन करते हुए बताया कि मेवाड़ में जस्ता उत्पादन करने की क्षमता 800 वर्ष पहले से है जो की विश्व में प्रथम है।
श्री कृष्णा जुगनू ने कहा कि उदयपुर की प्रमुख पहचान सिसोदियों से, 17 आने के सिक्कों से, सर्वाधिक धार्मिक ग्रंथ के चित्रों से, उभय मुखी दान से, प्रामाणिक ग्रंथ की कॉपी बनाने के लिए, कई तरह की पाग के लिए, सिंघाड़े की सेव के लिए, बिलसारू के लिए, करणसाही लड्डू के लिए, खिलौनों आदि से है जिन्हें बचाए रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
ज्ञान प्रकाश सोनी ने कहा कि उदयपुर की बसावट इस तरह की गई ताकि समान व्यवसाय के लोग आसपास रहकर संपर्क में रहे । समाज के नोहरे व मंदिर सामाजिक मिलन समारोह के केंद्र रहा करते थे।
डॉ उमाशंकर शर्मा ने कहा कि उदयपुर की संस्कृति झीलों जितनी गहरी, पहाड़ों सी मजबूत होकर राजसी ठाठ से ओत प्रोत है।
जयकिशन चौबे ने कहा कि मेवाड़ में सभी तरह के क्षत्रिय व ब्राह्मण सहित छत्तीस ही कौम के लोग भाईचारे से रहते थे।
संचालन डॉक्टर कुलशेखर व्यास ने किया तथा डॉक्टर डॉ आचार्य ने आभार व्यक्त किया।
ग्रुप कैप्टन गजेंद्र सिंह, श्याम सुंदर भट्ट, मनोहर लाल मूंदड़ा, इंदर सिंह राणावत, डॉ रमाकांत शर्मा, डॉ जीएल मेनारिया, हरीश तलरेजा, श्रीमती संध्या शर्मा, डॉ विमल शर्मा , डॉक्टर जय राज आचार्य, डॉ कुल शेखर व्यास, जय किशन चौबे, सौरभ भास्कर, नारायण पालीवाल, शोएब कुरैशी, गोविंद लाल ओड आदि उपस्थित रहे।