उदयपुर। समाजसेवी डॉ.लक्ष्मण सिंह कर्णावट द्वारा लिखित आत्मकथा अनुभूति और पुष्पा कर्णावट द्वारा संकलित बटोरी हुई विरासत पुस्तक का आज महाप्रज्ञ विहार में समारोह में लोकार्पण किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि राजस्थान विद्यापीठ के उपकुलपति कर्नल (प्रो.) डॉ.एसएस सारंगदेवोत और विशिष्ट अतिथि डॉ. देव कोठारी व पारमार्थिक सेवा संस्थान के सचिव मदन तातेड़ थे। अध्यक्षता डॉ. बसंतीलाल बाबेल ने की। संपादक और मुख्य वक्ता डॉ. प्रदीप कुमावत थे।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि कर्नल (डॉ) एसएस सारंगदेवोत ने कहा कि समाज के प्रति कर्णावट का समर्पण ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से दिखता है। लक्ष्मी का साथ सरस्वती की मौजूदगी कर्णावट परिवार में दिखती है। हमनें सभी परिजनों को भी सुना। यह एतिहासिक है कि सृजन, संवेदनाएं, संस्कृति और साहित्यिक यात्रा हमारे सामनें शुरू हो रही है। जब तक पुस्तक में मानव चेतना का विषय न हो तब तक उसका कोई महत्व नहीं रहता। इन दोनों पुस्तकों मे समावेश है। जीवन कैसे जीया जाएं और उसके साथ समाज सेवा कैसे की जाए, दोनों पुस्तकों मे इन सभी का अनुभव है।
मुख्य वक्ता डॉ. प्रदीप कुमावत ने कहा कि मंच पर पंच ऋषि और सामने विद्वत परिषद यानी सप्तर्षि का पीर तारामंडल विराजित है। अपने मन से ही कुछ बोलें अटलजी की कविता का उद्धरित करते हुए कर्णावट का शब्दों से सम्मान किया। जीने के उद्देश्य पर किताब का वृतान्त बताते हुए कहा कि आत्मकथा लिखना सरल नहीं है। चरित्र का धनी ही आत्मकथा लिख सकता है।
पुस्तक के लेखक लक्ष्मणसिंह कर्णावट ने कहा कि जन्म मरण के बीच क्या खोया और क्या पाया के बीच की यात्रा ही जीवन है। तीन आचार्यों की उदयपुर यात्राओं का वर्णन इस पुस्तक में किया। ये मेरे जीवन की अनुभूति है। काका की प्रेरणा से आचार्य तुलसी की सेवा फिर साध्वी प्रमुखा की प्रेरणा से तेरापंथ महिमा, मेवाड़ महिमा आदि पुस्तकों का लेखन किया। योग्यता से मुझे बहुत अधिक ही मिला। समारोह में पुष्पा कर्णावट ने भी विचार व्यक्त किये।
न्यायविद बसंतीलाल बाबेल ने कहा कि कर्णावट की रचनाएं उत्कृष्ट हैं। संकलन आसान नहीं भूसे में से दाना चुनने का काम करना है। आचार्य भिक्षु से आचार्य महाश्रमण तक की यात्रा का संकलन इस बटोरी हुई विरासत मे है।
टाडगढ़ के प्रो उमा शंकर शर्मा, भीखम चंद, मदन तातेड़, डॉ केएल कोठारी, राजसमंद के महेंद्र कर्णावट, सुरेश दक, तेरापंथ सभा के अध्यक्ष कमल नाहटा, मधु, दिनेश आदि ने श्री कर्णावट दंपती के बारे में विचार व्यक्त किये।
डॉ. देव कोठारी ने कहा कि कर्णावट का लेखन, काव्य, प्रखर भाषा, शब्दों का चयन और ऐसी घटनाओं का उल्लेख उनकी पुस्तक में है जिनका कहीं इतिहास मे भी वर्णन नहीं मिलता। अनुभूति मे वह सब है जिसको कर्णावट ने जीया है। आचार्य तुलसी की मेवाड़ यात्रा का पूर्ण वृतान्त आपने लिखा है। कोई डॉक्टर, लेखक नहीं होते हुए भी उन्होंने इतना कुछ लिख दिया है। एलएल धाकड़ ने भी विचार व्यक्त किये।
कर्णावट परिवार की बहू लता कर्णावट ने परिवार की ओर से अतिथियों का स्वागत किया। बटोरी हुई विरासत पुस्तक के बारे में उषा चव्हाण ने बताया कि साधु-संतों साध्वी वृन्दो की उत्तर का संकलन है। कार्यक्रम में सुरेशचन्द्र दक,राजकुमार दक,हर्षवर्धन चत्रावत,पारस परमार, दिनेश डागा, समुद्रगुप्त कर्णावट, डूंगरसिंह कर्णावट, एलएल धाकड़, महेंद्र, चैतन्य और मनीष कर्णावट, भगवतीलाल, पार्थ कर्णावट आदि ने अतिथियों का स्वागत किया। मंगलाचरण मीना कर्णावट एवं परिवार ने किया। संचालन आलोक पगारिया ने किया। धन्यवाद कमल कर्णावट ने दिया।
Udaipur
अनुभूति व बटोरी हुई विरासत पुस्तक का हुआ लोकार्पण
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